Wednesday, 30 August 2017

एक कहानी

कुछ कदमो की बात थी ? या कुछ जन्मों की बात थी?
हमे मालूम है ये  बस साथ चलने की बात थी.
मिले थे हम-तुम भी  कभी आँख के  इशारे पर
पलक झपकी तो आंसू की भी एक कहानी थी

Wednesday, 23 August 2017

शायद

तुम्हारे और मेरे अँधेरे
एक जैसे से लगते हैं
तुम भी डूबे  रहते हो
मैं भी डूबी रहती हूँ
अपने अपने अंधेरों में
पर बातें हम रोज रौशनी
की  ही करतें हैं
सुरँग  के उस ओर  से
रौशनी की एक किरण
शायद  सिमट डाले हमारे
अंधेरों को
फिर शायद हम बढ़  पायें
सूरज की जमीं तक आती
किरणों की तरफ़.


Monday, 7 August 2017

एक सोंच


एक सोंच सी उभरी थी उस दिन

एक कमरे में थे हम -तुम
भागते चीखते बच्चों में
खुद को बूढ़ा सा पाते हम तुम
बूढ़े माँ- बाप की कतारों में
खुद को बच्चा सा पाते हम-तुम
फिर उसी दोराहे पर अटके है हम-तुम
काश फिर से बच्चा बन पाते हम-तुम
काश बुढ़ापे तक न पहुँचते हम-तुम

एक सोंच सी उभरी थी उस दिन


Sunday, 28 May 2017

तन्हाई

"तन्हाई " भी तन्हा रहती होगी कहीं
मुझसे मिलते ही धूप  की तरह पसर जाती है। 

Sunday, 5 March 2017

मुझसे कुछ तो कहो

मुझसे कुछ तो कहो
दुनिया की तो रोज कहते हो
मुझमें कुछ तो रहो
दुनिया में रोज रहते है 

Tuesday, 28 February 2017

नया इश्क़

नया इश्क़ नयी मंजिल और नयी में
तेरी यादों को जैसे किनारा मिल गया
वो जो होठों पर आती है धीमी सी मुस्कान
तेरी यादों को भी रहने का ठिकाना मिल गया


यह मेरी किस्मत ही है


यह मेरी किस्मत ही है तुमने ऐसे मेरा आस्तित्व
निगल डाला
जैसे समुन्दर निगाहों को डुबो डालता है
जो उसकी सीमा नापना चाहे ये मेरी किस्मत ही हैजो तुमने मुझे मिटा डाला ऐसे जैसे रेत  पर लिखे  मेरे नाम से तुम्हारी  पागल लहर बच कर  न निकल पायी हो
यह मेरी किस्मत ही है जो  तेरी चाह का वजूद भी
ऐसे ख़त्म होती गयीं
जैसे नजदीकियां जीवन की
बेवक्त बेमौत मारी जाएँ 





Monday, 27 February 2017

कलम के होठों पे भी पीड़ा की बूँद है
पर लिखती नहीं कभी भी खुद से खुद को.