Tuesday, 12 December 2017

यादें

मुझे मत ले जाओ उन बीती गलियों में
वहां की यादें अक्सर याद आतीं हैं 

Wednesday, 6 December 2017

मैं और तुम

तन्हाई की आवाज़ भी
टिक टिक टिक सी  बजती है
एक शोर सा उठता हैं, चुपके से
मेरे दिल  और मष्तिस्क से होते हुए
कान में कुछ गर्म सा पिघलता है
दूर एक बादल पर चाँद की आखरी चांदनी
जैसे अँधेरे से पहले सुनहरी होती है
वैसे ही तुम्हारी याद  भी मेरे पलकों से निकल
मेरे सपनो में फैल जाती है
और मैं सो जाती हूँ पर तुम जाग जाते हो







Tuesday, 5 December 2017

यादें

तुम्हारा दिल जब हमें याद करके  मुस्कराता है


तुम्हारी आँख में एक सुकून सा बिखर  जाता है 
मैं तुम्हारे पास हूँ, या नहीं हूँ मैं ज़ेहन के बंद  कमरे में 
यादों का सिलसिला बिखर  सा जाता है 


Tuesday, 7 November 2017

मेरे जज़्बातों  का ठोर ठिकाना बदल गया
तुम क्या गए ,सपनो का आना बदल गया 

Wednesday, 30 August 2017

एक कहानी

कुछ कदमो की बात थी ? या कुछ जन्मों की बात थी?
हमे मालूम है ये  बस साथ चलने की बात थी.
मिले थे हम-तुम भी  कभी आँख के  इशारे पर
पलक झपकी तो आंसू की भी एक कहानी थी

Wednesday, 23 August 2017

शायद

तुम्हारे और मेरे अँधेरे
एक जैसे से लगते हैं
तुम भी डूबे  रहते हो
मैं भी डूबी रहती हूँ
अपने अपने अंधेरों में
पर बातें हम रोज रौशनी
की  ही करतें हैं
सुरँग  के उस ओर  से
रौशनी की एक किरण
शायद  सिमट डाले हमारे
अंधेरों को
फिर शायद हम बढ़  पायें
सूरज की जमीं तक आती
किरणों की तरफ़.


Monday, 7 August 2017

एक सोंच


एक सोंच सी उभरी थी उस दिन

एक कमरे में थे हम -तुम
भागते चीखते बच्चों में
खुद को बूढ़ा सा पाते हम तुम
बूढ़े माँ- बाप की कतारों में
खुद को बच्चा सा पाते हम-तुम
फिर उसी दोराहे पर अटके है हम-तुम
काश फिर से बच्चा बन पाते हम-तुम
काश बुढ़ापे तक न पहुँचते हम-तुम

एक सोंच सी उभरी थी उस दिन