Thursday, 14 July 2011

जिंदगी

तुम और में
जब निकले थे घर से
मंजिल की खोज में
दौरना  सिखा ,कर

जिंदिगी बोली
भागो वर्ना पीछे छोड़ जाउंगी

दौड़ने की आदत ने
रोका ही नहीं
अपने ,और भी पराये हुए
रास्ते, और भी अनजाने हुए
चलते चलते वादों की भीढ़ में
कुछ उनके,संग, कुछ अपने  संग
सफ़र ख़त्म होने चला
वादे कुछ,टूटे, कुछ अधूरे
हम संभालते चले

जिंदिगी बोली
भागो वर्ना पीछे छोड़ जाउंगी

रास्ता ढूंढ़ने  चले है
इस थकन के साथ
रूक जाये, कुछ जी जाये
कुछ पल का आराम
कहीं मिल जाये


जिंदिगी बोली
भागो वर्ना पीछे छोड़ जाउंगी



जिन्दिगी सुनो.
हमे धीरे धीरे तो चलना है
इन काटों पर सोना है
झूटी हंसी हस कर भी रोना है
अब न एहसास है इस दौद्र
न दर्द का



सबसे दूर, इस अनजानी भीड़ में
एक चेहरा सुने देता है
जिंदगी  सुनो, थोडा रुको,बस चलो 
हमारे  साथ,
डाले हाथ में हाथ

जिंदगी बस रुको

Monday, 11 July 2011

एक प्यास

एक प्यास है
जो भूख में बदली  जाती है
और एक भूख  है ,जो
खामोश मुस्कराती है
बुलाती है मुझे उस पार
हर बार
एक नए अंदाज में
और मैं कांप सी जाती हूँ
उस प्यारे से सिहरन को
छू कर मुस्कराती हूँ
हर बार

नजरों से कई बार इशारे
से हर बार
प्यार से बोला तो है
सिहरन को पलंग 
के सिरहाने छोड़ा तो है
हर बार
लिपट सी जाती है
और कानो में आ 
धीरे से कहती है
'बोलो ना' एक बार 'बोलो ना'
हर बार