Friday, 5 August 2011

ek saya

साया हूँ मै, मुझे साया ही रहने दो
स्याही सा लिपट जाता हूँ तुमसे
मुझे अंधेरे में साथ चलने की आदत  है
उजाले की चमक से  डर जाता हूँ
उम्मीद नहीं है तुमसे ,
तब भी यह कभी सोचा तो है
की तू हंसे तो मैं भी मुस्करा दूंगा
कही गिरे तो बीछ जाऊंगा सड़क पर
तू चल दे कही तो मैं भी कही छुप जाऊंगा
साया हूँ  मै, मुझे साया ही रहने दो.........

Thursday, 4 August 2011

ek daurd.

दिल की बेचैनी को  क्या दोष दूँ
यहाँ साँस भी एक मुसीबत में है
है एक जनून की कौन करेगा पहल
तुझ को भुलाने की दौड़  में



Wednesday, 3 August 2011

My mom

my mom, has gone today, and i dont like it. i felt the same pain, when i left my house 25 years ago. she was crying but she did not want any body to see.,today i was crying but i did not want any body to see.
how we live our life i thought, when we cant even express what we really feel.
feelings are real, the  show is unreal,.i wish i could give up the show.i dont want to live this life any more.

Tuesday, 2 August 2011

अपने देश

अपने देश

अब  जा कर क्या करुँगी ?
मेरा गाँव बदल गया
मुझे नहीं बुलाता अपनी ओर
मैं यहाँ रुकी निहारती रही
और जमी खिसक गयी

कल तक पिछवारे की बेल 
भी पुकारती थी
पास जाने पर गले लगाती थी
नुक्कर्ड का चाट वाला भी
चाट के साथ एक मुस्कान 
मेरे  लिये ही बेचता था

अब जा कर क्या करुँगी?
इस दूर देश में
डर लगता है 
अपने से , अपनों से 
आँख में आंसू छुपाये 
अब जा क्र क्या करुँगी ?






Monday, 1 August 2011

आने के ही साथ जगत में कहलाया 'जानेवाला', स्वागत के ही साथ विदा की होती देखी तैयारी,

there is a terrible pain in my heart, to think my mom is going.I have this woozy feeling in my brain, and eyes which wants to cry a lot but cant because i have to be strong and have to show the world that nothing bothers me.
i am just so tired of pretending, so very tired, i dont want my mom to go. i love having her here.

but as bachan says
 आने के ही साथ जगत में कहलाया 'जानेवाला',
स्वागत के ही साथ विदा की होती देखी तैयारी,
so who ever has come has to go so why the pain? why does it hurt so much?

Sunday, 31 July 2011

Mirza Ghalib (how true)

wish i knew what made you write this


यह संग्दिलों की दुनिया है 
यहाँ संभल के चलना ग़ालिब
यहाँ पलकों पे बिठाया जाता है
नजरों से गिराने के लिए









tum

बस आज तुमसे यही कहना है
की तुम कहो, की कब तक चुप रहना है

कि दोस्त तो तुमको भी हैं और मुझको भी
किसी संगदिल से  फिर, क्यों दिल लगाना है

चले जाओ मेरी दुनिया से एह दोस्त
कि यु भी तो कहीं दूर तेरा ठिकाना है