Friday, 19 August 2011


चल, चल कर देख दो कदम , संग में
दूसरी दुनिया के रंगीन सफ़र पे
आंसू भी जहाँ प्यारा सा गुलाबी हो
आग हर सीने में बरसाती हो
तितलियां फूलों से आँख मिलाती हो
तारे  हर राह  पर लुभाते हो
चाँद भी कभी दूर बादलों में
उंगली दाबे मुस्कराता हो
चल चल कर देख दो कदम , संग में
जिंदगी कट जाएगी एक ही पल में


Thursday, 18 August 2011

expectations

My friend Claire once told me, never Expect, always  Hope, and things will work out eventually.Today, i am finding it very difficult to swollow. its almost painful, not to expect. I will try to Hope for the best.

jamana (i am upset tonight)


जमाने ने दिये जख्म कुछ एसे 
कभी हम सह नहीं  पाये कभी हम कह नहीं पाये
मुहब्बत की कहानी सुन मेरे  दोस्त
कभी यह रुलाती रही  कभी हम रो नहीं पाये

मचला है सैलाब इन आँखों में इस तरह
कभी मैं रोक  नहीं पाया ,कभी  यह बह नहीं पाये
न जाने कब ख़त्म होगी यह अँधेरी रात
सवेरा  रूठ कर हमसे , हमेशा मुह छुपाये है,



Tuesday, 16 August 2011

मन

आज फिर मन नमकीन सा क्यूँ है
आंसू  सुख गए तकिये की सिलवटो में
प्यार उदास, पड़ा है सिरहाने पर
आँखों में तेरे  धुंआ धुंआ सा क्यूँ है

तुमको तलाश भी ऐसी है जानम
की हर प्याले में शराब ढूंढता चल
मैं चुप रहूँ तो भी  सुनता हूँ तुमको
बोलूं  तो  फिर,क्या मिला जानम

आँख मूंद कर उन सलाखों के पार
जिसका चेहरा नजर आता हो
वो भी तो कैद है कहीं
तकिये की सिलवटों से पूछ लो


mein aur mera dost

सूरज को अंधेरे से बचाऊं कैसे
की हर तरफ आग ही आग है
तू कहे तो छुपा लूँ,मैं सीने में
या आग लगा दूं इस जमाने में
वो यह कहता है की
विशवास नहीं है दोस्ती पर,
तुम्ही कहो की
विशवास दिला दूं कैसे
सूरज को अंधेरे से बचाऊं कैसे



mein aur mera aks

अब मेरे साथ नहीं हूँ मै
आइना भी हैरानी से देखता मुझको
आइना तो एक है टुकङूँ में बट गया हूँ मै

दिन सुभ्हा से खींच कर शाम की ओर लेजाता हुआ
मौत औरv ज़न्दगी अपने अपने हिस्से के लिये लडती हुई
बीखेर कर फैला देतीं हैं मूझे
इंतहा कोशिशों से भी नहीं सिमटा हूँ मै

पहली रात की चादर जैसे
या कहौ जैसे किसी हुस्न कि खूली ज़ुल्फें
कुछ कुचली सी कुछ उलझी सी ज़िन्दगी
बेजान हवा के सहारे जीता हूँ मै

मेरे टुकडौं को रौंधती चल्ती है अपने परायों कि भीड
कभी जान कर कभी अनजाने से कुचलती हुई
देखतें है तो बस मेरा मुसकुराता चहरा



मुझको उदास क्यों देख नहीं पाते
शीशे के बिखरे टुकडे
पूछते हैं अकसर
कि तू मुसकुराता है तो उदास क्यों दिखता है

इन सवालों का कया जवाब दें
कुचला हूँ मसला हूँ टुकडौं मे बट गया हूँ मै
कि अब तो आइना भी हैरानी से देखता मुझको
अब मेरे साथ नहीं हूँ मै

Sunday, 14 August 2011

tulsi

तुलसी का पौधा हो तुम
बोया है हमने तुम्हे
नन्ही सी थी तुम
उगाया है हमने तुम्हे

बोया है तुमने हमे
तुम्ही उखाड़ओगे हमे
तुम्ही भेज दोगे मुझे
किसी और आँगन में सजे

उखाड़ा जब तुमने हमे
रोये  हम छटपटा कर
मत उखारो मत उखारो
तुम्हारी तुलसी हूँ , मत उखारो

तुम भी रोये  छटपटा कर
बोले दुनिया की रीत है यह
बोया है हमने तुम्हे
फेलोगी किसी  और अंगने में

फिर कभी अंगने में
जब चले आंधियां जोर की
कोई उखारे फिर हमे
क्या करेंगे हम रो के भी

फिर कहेंगे छटपटा कर
हमारी जड़े हैं यहीं
मत उखारो मत उखारो
तुम्हारी तुलसी हूँ , मत उखारो

यही कहानी हर तुलसी की
उगती है कहीं बढती है कहीं
रोए उस गमले में भी
रोऐ इस अंगने में भी









बचाया है