Saturday, 10 September 2011

mirza ghalib

तुम न आए तो क्या सहर[1] न हुई
हाँ मगर चैन से बसर [2] न हुई
मेरा नाला[3]सुना ज़माने ने
एक तुम हो जिसे ख़बर न हुई

Friday, 9 September 2011

मोहताज़ नहीं है यह जिंदगी
इंतज़ार के किसी के
यह वक़्त गुजर  ही जाता है
 दो राह पर चल के

Thursday, 8 September 2011

poetry by kumar vishvas

Teri kudrat ka karishma kamaal hai Maula ,
Pahle jiina tha ab marna muhaal hai Maula,
Ishq ke hisse me itni udasiyna kyun hain ?
Bada chhota sa mera ek sawaal hai Maula ..."

Sunday, 4 September 2011

तन्हाई

मैं जब एक अकेली तन्हाई से बाते करती हूँ, तन्हाई, हर बार मुस्करा कर बाते, सुनती है,हर बार बहलाती है
मैं जब अंधेरों में रोया करती हूँ,तन्हाई , कुछ पास से,गुनगुनाती है!और मैं अक्सर यह सोच के घबरा जाती हूँ
की मेरे पास तो मेरी तन्हाई है! मेरी बेचारी तन्हाई पास भी नहीं ! दिन -रात  बिना मतलब घुमती है मेरे आगे पीछे  

problems.

It feels weird when somebody does not want to share their problem with you and you thought that you are so close, or may be you thought that you know it all or maybe that people trust you. It feels weird. what is the point of sharing any sort of thoughts or any sort of feelings, it is usually interpreted in somebody else thoughts.

Today i just hope and wish that i am able to help somebody, any body and that is it. I feel i don't want anything more from life, i feel content.