Thursday, 10 November 2011

दुःख और सुख


दुःख और सुख में
रिश्ता कुछ  पुराना है
आधे अधूरे शब्द बेचारे
हर रोज मुझे बुलाते हैं
अपने होने,और मेरे होने
का जश्न यही मानते हैं

दुःख अक्सर सुख को ,
पास मेरे रख कर  जाता है
सुख, मुझे अकेला हंसते,
देख मन से दुखी हो जाता है

रोज यहीं  चौखट पर
सुख और दुःख
आते जाते मिलते हैं
ध्यान रखना इस  पगली का
एक दूजे को  कहते हैं

मैं  भी अनचाहे, युहीं अक्सर
मन ही मन समझती हूँ
दुःख आया, है  तो
पास ही, होगा सुख भी
सुख आया तो चौखट
पर अटका है दुःख भी 

Monday, 7 November 2011

मैं आज जब चाँद को बताने लगी

मैं आज जब चाँद को बताने लगी
उनसे मिलने के  कई नये अंदाज
चाँद मुस्करा कर शरमा कर
बादलों में छुप गया,

मैं हर रोज नयी दुल्हन बनी
मन की खिड़की में बैठी रही
चाँद भी रोज चुप-चाप ,
आधा- अधुरा होता रहा

है चाँद ही हमसफ़र मेरा
दोस्त भी , प्यार भी
मिल -जुल कर सुलगते हैं
हम रोज आशिको की तरह .......







छोड़ आते हो यादें मेरी.


मैं हर रोज तस्वीर अपनी
तुम्हरी धड़कन  में टांग आती हूँ
और तुम हर रोज, हर राह पर
छोड़ आते हो यादें मेरी.