Saturday, 19 November 2011

Khwaab by dr. kumar vishvas


ख़्वाब इतने तो दगाबाज़ न थे मेरे कभी ?
ख्व़ाब इतनी तो मेरी नीँद नहीं छलते थे ?
दिन निकलते ही मेरे साथ-साथ चलते थे,
मैं इन्हें जब भी पनाहों में जगह देता हुआ,
अपनी पलकों की मुडेरों पे सजा लेता था ,
पूरा मौसम इन्ही ख्वाबों की सुगंधों से सजा,
मेरे चटके हुए नग्मों का मज़ा लेता था ,
कुछ हवाओं के परिंदे इन्ही ख़्वाबों में लिपट,
चाँद के साथ मेरी छत पे आ के मिलते थे ,
ये आँधियों को दिखा कर मुराद कि जीभें,
मेरे आखों में चिरागों कि तरह जलते थे ,
और ये आज की शब इनकी हिमाकत देखो,
इतनी मिन्नत पे भी ये एक पलक-भर ना रुके,
इनकी औकात कहाँ ?ये है मुकद्दर का फ़रेब,
इतनी जिल्लत कि मेरे इश्क़ का दस्तार झुके,
ये भी दिन देखने थे आज तुम्हारे बल पर,
ख़्वाब कि मुर्दा रियाया के भी यूँ पर निकले
तुम्हारी बातें, निगह, वादे तो तुम जैसे थे,
तुम्हारे ख्वाब भी तुम जैसे ही शातिर निकले ....

Friday, 18 November 2011

Death of Relationships

I am not worried of death
which comes for me.
I don't care,not bothered too
coz death, is such a good freind
it spare no moment
for you to be sad,
or be hurtfull.
what do they say...?
ya, once you are dead
YOU ARE DEAD

But its the slow death
of realtionships that
hurts me.
a life time passes by
to think and notice
what went wrong.
A lifetime passes by
and you see the crumbling
death infront of your eye
its stays there,
but actually not there

A life time passes by
to see a reationship die........




Thursday, 17 November 2011

Its ok......

so , its ok you are not my love
so,  its ok you dont belong
so, its ok to live without you
just that, people dont understand
how i live and breathe without you
how i laugh and cry without you
how i sleep and dream without you
just that people dont undersatnd
how i walk and dance without you
how i think and talk without you
just that, people dont undersatnd
just that, people dont understand

Monday, 14 November 2011

क्या तुम्हे मालूम है ?(part 3)

क्या तुम्हे मालूम है ?
रात अब कितनी अँधेरी हो उठी है
कही कुछ नजर नहीं आता
कहीं एक दिया भी नहीं जलता
पूरा शहर उदास और वीरान है

याद है तुम्हे, पहले
बारह मॉस , पूनम की रात रहती थी
चाँद, शर्माता -लजाता मेरे
आँचल  में रहता था
तुम और मैं उसे देख
कितना खुश होते थे

अब चाँद रोज  महज़
शहर घुमने आता है,

ओ मेरे सुख-दुःख के साथी
क्या तुम्हे मालूम है?
की मैं खुश हूँ 
की दुखी हूँ ????????


क्या तुम्हे मालूम है ?



क्या तुम्हे मालूम है ? (Part 2)

क्या तुम्हे मालूम है ?
कब दोपहर होती है?
और सूरज आग-बबूला हो
मेरी खिड़की में आ खड़ा होता है
जैसे कहता हो .
की बस मेरे कारण आना पड़ा
की कब दिन हो, शाम हो ,और रात हो
और एक बरस बीत जाये


याद है तुम्हे ,पेहले
खिड़की, में सिर्फ मैं ही रहती थी
तुम्हारा इंतज़ार करती
सूरज मुझसे मुह  छुपाये 
भागा जाता था

क्या तुम्हे मालूम है
फिर शाम आ गयी है
जाने क्यूँ काली काली सी लगती है शाम
पेहले तो , कभी गुलाबी, कभी लाल-पीली
साड़ी पहने मेरे साथ घुमती थी
और सदा हँसती रहती थी शाम








क्या तुम्हे मालूम है ?

क्या तुम्हे मालूम है ?
कब सुबह होती है ?
और सूरज मुह फुलाये आता है
जैसे कहता है रोज
की फिर एक बार आना पड़ा


और मैं भरी चाय की प्याली ले
यादों की दरिया में  
दस बार नहाती हूँ
तब भी तुम नहीं आते

याद है तुम्हे मेरी वो खिट-पिट
तुम . खीजते- खिजाते उठ कर
चाय और मेरी सौतन के साथ
बाथरूम में चले जाते थे
और मैं बाहर, मुस्कराती 
और इंतज़ार करती थी


अब सुबह युही आती है 
और चली जाती है
सूरज भी, महज
दुनियादारी निभाने आता है
सिर्फ मैं अपनी चाय लिये
यादों की दरिया में
दस बार नहाती हूँ














सूरज

सुनो
तुम जो आसमान में रहते हो
बादलों में  छुपते हो
मैं जानती हूँ
तुम , मुझसे प्यार करते हो
सुनो
कभी अपने उजाले से
निकल मेरे अंधेरों में आओ
और बेठो  और देखो
अंधेरे मन में , तुम्हारा 
उजाला ,आग लगता है,
सुनो
ध्यान देना
कहीं मेरे होठों की सुर्ख़ियों
में तुम्हारा ताप खो न जाये?
ध्यान रखना
कहीं मेरे आगोश में 
रात हो न जाये?
तुम तो सूरज हो
चमका करो, रोज दिन में
मैं धरती हूँ ...
जीती हूँ बस चाहत में