Friday, 20 January 2012

मैं और मेरी बैचैनी ... अक्सर यह बातें करतें हैं

रोज, को कई ढंग से समझा लिया मैने
लोग बहुत व्यस्त हैं तो ठीक ही है
हम बेकाम, लाचार ही भले
बस अब खुद के बाहर निकल आना है 


एक जंजीर सी पड़ी है रूह पर
चारदीवारी भी मेरे हाल पर  सिसक उठी है 
रूह के अंदर जो एक ख्वाब है ,मरा हुआ
उसे अब पंख पसार कर उड़ जाना है 

जिंदगी तुझ को कैसे मैं नाराज करूँ?
कैसे  रूह को अब फिर से आजाद करूँ?
चार दिवारी से अब रिश्ता तोड़
अपनी हिम्मत को फिर एक बार सहारा दे दूँ.










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