Wednesday, 8 February 2012

By dr. kumar vishvas

लौटते समंदर के रेत पर
बची रह गयीं प्यास की लकीरों जैसी
आधी रात इक गुमनाम स्टेशन के
उबे हुए मुसाफिरखाने की
थक कर पकतीं नीदों में
गूँजतीं इंजन की रोबदार आवाज़
मुझे करवटें बदलवा कर
फिर-फिर याद दिलातीं है
इक अनहद अब भी ज़िन्दा है
जो बस तुम्हारी आवाज़ से जगता है .

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