Thursday, 23 February 2012

अज्ञात मित्रता (by Vipin sharma)


अज्ञात मित्रता

पहले व्यंग ने हवा भरी ,
तत्पश्चात मर्मभेदी टिपण्णी आई  ,
छोटी  उपहासी मुस्कराहट ,संदिग्ध भावें
ओह ! विवाद आरम्भ हो गया  !
समय गुज़रता गया  …….

केवल एक अवनाछित प्रकृति को ग्रहण कर हम  ने आरम्भ किया .
यद्यपि उपहास जितना चिरकालीन होता जाता है ,
एक दुसरे की पहचान का प्रत्यक्षीकरण  उतना ही  कड़ा हो जाता है .

विडम्बना  - मेरा  एकमात्र  लक्ष्य  है  - ''आपका  वास्तविक  तथा यथार्थ  अनावरण '
दुर्भाग्य से ,समय  ने  उस  व्यनाग्योक्ति  को  एक  विशाल  दानव  का  सा  स्वरुप  दे  दिया  है
जिसके  सम्मुख  हम  दोनों  के  वास्तविक  यथार्थ  महत्वहीन  प्रतीत  होते  हैं .

यदि  मैं  ने  कभी  आपसे पूछा  होता ,की  क्या  हम  इस  परिस्तिथि  को  सुधार  सकते है
आप  का  निश्चित  ही ,  ये  उत्तर  होता ,"हाँ   हम  ऐसा  कर  सकते  हैं ."

ये  निश्चित  है  के  प्रकृति  अपना  कार्य  करगी ,
हम  परेशानिओं   को  अपास्त  कर  ,अपने  जीवन  में  आगे  बढ़ेंगे

यद्यपि  हमारे  मानस  में ,हमें  पृथक  करती सीमा  हमेशा विद्यमान  रहेगी ,
क्या  हमारी  मित्रता  कभी  भी  निश्चिन्त  एवं सत्य  होगी  ?

(अपने   मानस  में  ……..)

मैं   आशा  करता  हूँ …..

मैं  प्रार्थना  करता  हूँ  ……… 

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