Friday, 25 May 2012

निदा फ़ाज़ली

यही है जिन्दगीं कुछ खाब ,चंद उम्मीदें ,
इन्हीं खिलौनों से ,तुम भी बहल सको, तो चलो !
कहीं नहीं है कोई सूरज , धुआं - धुआं है फिज़ा ,
खुद अपने आप से बाहर निकल सको, तो चलो !!(निदा फ़ाज़ली ).

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