Saturday, 12 May 2012

parvin shakir

चेहरा मेरा था निगाहे उसकी
खामोशी में भी वो बातें उसकी 

मेरे चेहरे पे ग़ज़ल लिखती गयी 
शे'र कहती हुई आंखे उसकी 

ऐसे मौसम भी गुजारे  हमने 
सुबहें अपनी थीं और शामें उसकी 

फैसला मौजे-ए-हवा ने लिखा 
आंधियां मेरी बहारें उसकी 

दूर रह कर भी सदा रहती हैं 
मुझको थामे हुए बाहें उसकी 

नींद इस सोंच से टूटी अक्सर 
किस तरह कटती हैं रातें उसकी 

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