Tuesday, 5 June 2012

बादल


मैं बस अपने अंदर ही रख लेती हूँ
सपनो को, बाहर नहीं निकालने देती
मेरे सपने जो कभी बादल बन
हर रंग हर रूप में ढल जाते हैं

बादलों में मुझे  चेहरे देखाई देते है
उन चेहेरों के दिल कभी गरजते हैं
कभी चुपचाप बेआवाज़ गुजरते बादल
मुझको तनहा देख बरसते हैं.........

बादलों के पाँव कभी देखे हैं?
डूब कर झील में फिर  उभरते हैं
मैं बन जाऊं गर छत का मायूस कोना
आँखों से अपनी , आंसू मेरे बरसाते  हैं.

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