Friday, 1 June 2012

एक लड़की

मेरा बचपन बीत गया
न जाने क्यों अचानक याद आती है
वो शाम जब एक छोटी सी लड़की 
बन जाती है युवती, बहु और पराया धन
यानी एक बेटी कई भागों में बट जाती है

कितने भागो में बाटे एक छोटे से मन को?
कितनी बार, मन के आँगन में
संकुचित उँगलियों से 

सिर्फ ढाई अक्षर तो लिखती है 
ढाई अक्षर ही तो मांगती है 
लगता है गलती से प्रेम लिख बेठी
कठिन शब्द है , लोगों ने सुना नहीं,
कभी भी समझा नहीं
कितनी बार, जब सूरज को ढलते देख, 
शाम का आँचल पकडे
जब उतर के आती  है रात
मेरी सखी बन,  मन टटोल जाती है
प्यार से अपने आगोश में सुलाती है
और मैं हर बार ,सिर्फ ढाई अक्षर मांग  बैठती हूँ 

मुर्ख हूँ ,नादान हूँ 

अभी तक नहीं समझी 

प्रेम का चरित्र
प्रेम मिलने वाली चीज़ नहीं है
कहीं बहुत दूर सितारों में रहती है शायद
बडे किस्मत वालों के पास जाती है
मैं अपने मन का दरवाज़ा खोल 
बाहर तक राह निहार आती हूँ
दूर भागती हुई एक लड़की को देखती हूँ
जो हर पल मुझसे दूर होती जा रही है 
नाराज है  शायद मुझसे
या जमाने से 
काश मैं उसे समझा पाती
कितना मुश्किल है
इन ढाई अख्छरों का सफ़र

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