Sunday, 1 July 2012

"जाज"

"जाज" की धुन पर नाचते
मैं और तुम पूरी रात नहीं थकते
तुम्हारा चेहरा मेरे सर पर टिका है
हमने शायद नजर भर देखा नहीं है
एक दूसरे को।
कहो मेरी आँख का रंग भूरा है या गुलाबी ?
पर मेरी कमर को तुम्हारी उगलियों की
गर्मी कैसे याद है ?
गहरी साँसों की गर्मी में थिरकते होठ
व्याकुल मन को पिघलते देखते हैं
झुकी नजर से मैं अपराध को स्वकृति देती
देवी जैसी महसूस करती हूँ
तो कहो अपराध का रंग नीला है की हरा है ?
इस मदहोश नाच में , मैं और तुम
कैसे गुलाबी हो उठे हैं
आँख बंद किये मैं कुछ नहीं सोचती
कुछ भी तो नहीं कहती
सिर्फ वो "जाज" की आवाज़ सुन
मेरे थिरकते कदम
लोगों से, भीड़ से , समाज से
मीलों दूर निकल आये है
अब बस मैं हूँ और तुम हो
और हमारी साँसों में
बजती वो "जाज "की वो धुन  है 

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