Thursday, 19 July 2012

जिस चार दिवारी में, मैं हर दिन आबाद हुई

जिस चार दिवारी में, मैं हर दिन आबाद हुई
इस चार दिवारी में, मन अब लगता नहीं है
खोल के पंख अब उड़ सकूँ आकाश में
चिड़ियों  के पंख घर  बैठ कर तो  गिनते नहीं है








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