Wednesday, 15 August 2012

और फिर "आज" मर जाता है

अलसाई शाम ढलने से पहले
गुलाबी ओढ़नी लिए दबे पाँव
रात के सिरहाने बैठती है
चाँद भी कुछ संकुचाया सा
थोडा शरमाया सा ,बादलों
की ओट से निकलता है
पंछी  अपनी धुन में गीत गाते
डूबते सूरज की स्याही में
अपने घर को उड़ रहे हैं
मैं भी अब कुर्सी पर आधी जगी
आधी सोयी सी
बंद होती पलकों से
उस लम्हे को गुजरते हुए देखती हूँ
जिसका  नाम "आज" है 
"आज" जाने से पहले
मेरी आँखों मे अपना प्रतिबिम्ब देखता है
उसे मालुम है फिर कभी मेरी आंखे
उसे नहीं देख पाएंगी और वो भी
कभी मुझसे मिल नहीं पाएगा 
बिछड़ जाने की विचलित सी अनुभूति
में हम दोनों एक सी पीड़ा जी लेते हैं
और फिर "आज" मर जाता है
और मैं सो जाती हूँ .....





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