Thursday, 2 August 2012

और कुछ देर चिरागों अभी जलते रहना

और कुछ  देर चिरागों युहीं जलते रहना 
मुमकिन है ,की दुनिया ने समझा ही नहीं
कितना  मुश्किल है दिन रात युहीं जलते रहना 
मैं तो खुश हूँ की तू साथ मेरे जलता है
वर्ना मशरूफ  जमाने का  वक़्त बर्बाद करते
युहीं रोज दर्द-ए -जिगर दिखाने क्या जाते  
और कुछ  देर चिरागों युहीं जलते रहना

और कुछ देर चिरागों अभी जलते रहना
सफ़र में मुमकिन है वो साथ चले  भी नहीं
मंजिल-ए -दिल शायद कभी मिले भी नहीं
कितने अधूरे अफसाने लिये महकती है फिजा
कितनी बिखरी हुई आरजू लिये उडती है हवा
एक तू है की साथ मेरे जलता है
और कुछ देर चिरागों अभी जलते रहना .....

और कुछ देर चिरागों अभी जलते रहना 
रास्ते में हैं अंधेरे नसीबों की तरह 
हर मुस्कान के पीछे रुसवाई है 
हर शख्श से दूर उसकी परछाई हैं 
एक तू है की साथ मेरे जलता है 
और कुछ देर चिरागों अभी जलते रहना  

और कुछ देर चिरागों अभी जलते रहना
नये मुसाफिर को राहें गुमराह करती हैं
हर एक ठोर को मंजिल समझता है
हर नयी उम्मीद पर दिन बदलता है
हर नये ख्वाब को दिल, सच समझता है
एक तू है की साथ मेरे जलता है
और कुछ देर चिरागों अभी जलते रहना...


और कुछ देर चिरागों अभी जलते रहना
हर आस ,हर उम्मीद धुआं धुआं सा है
दिल-ए-अरमान भी बुझा बुझा सा है
एक तेरी लौ जो टिमटिमाती  है
कभी बुझती है कभी खुद से जल जाती है
एक सुरंग से आती रौशनी की तरह
तू  ही है की साथ मेरे जलता है
और कुछ देर चिरागों अभी जलते रहना


और कुछ देर चिरागों अभी जलते रहना
कितनी मजबूर है मोहबत यह तू देख जरा
आह भर्ती है मोहबत  पर कहती नहीं
कितने अफसाने देखे है तूने ख़त्म होते
कितने परवाने देखे है शमा पर फन्ना होते
कितनी आँख से आंसू बहे मोम बनके
एक तू है की साथ मेरे जलता है
एक तू है की साथ मेरे पिघलता है






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