Monday, 20 August 2012

जैसे एक लम्हे को एक याद ने कैद किया हो एक उम्र के लिये

सुनहरी रात में जब छत पर बैठे थे हम तुम
उस अंधेरे में किस से हमे छुपाया था तुमने
वो  मेरे माथे से लट हटाते ही,उँगलियों  से
अधूरे शब्द में क्या  लिखा था मेरे होठो  पर ?
क्या लिखा था उस रात, तो मैं पढ़ नहीं पाई
पर मेरे बदन को वो सिहरन अब तक याद है
जैसे एक लम्हे को एक याद ने कैद किया हो एक उम्र के लिये 

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