Thursday, 30 August 2012

तुम्हारी यादें

मुझे भी मुक्ति चाहिये, थोड़ी नहीं पूरी  

काश तुम्हारी यादों को मैं 
जीवन की किताब के किसी
पन्ने की तरह फाड़ कर फेंक सकूँ
पर जब मन सो जाए तो धीरे से
पन्ने को सीधा कर तकिये के  नीचे रख सकूँ
सोचती हूँ तुम्हारी यादें  सपना बन कर
मेरी नींद में आने लगेंगी
तो फिर यह कैसी मुक्ति होगी
थोड़ी ? की पूरी ???????

काश तुम्हारी यादों को एक संदूक में
बंद करके समुन्द्र में बहा सकती
अगर कभी किसी को
मिलता यह यादों से भरा संदूक
और वो खोलता तो वो सब यादें
मुक्त हो आकाश में उड़ जातीं
और  फिर मेरे पास लौट आतीं
और मुझे कोसती, की मैने क्यूँ
उन्हे अपने से दूर जाने दिया
तो फिर यह कैसी मुक्ति होगी
थोड़ी ? की पूरी ???????????

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