Tuesday, 18 September 2012

मेरा अक्स

आयने से  निकल कर, मेरा अक्स
मुझे , अपने साथ लिये जाता है
 मैं जागती आँखों का सपना बन
 दूर तक, साथ उसके जाती हूँ
 आँखों की लम्बी एक टक नजर
 मुझको दर तक तेरे छोड़ जाती है
  दरवाजा खटका दूँ या चली आऊं वापस ?
 इसी पशो-पेश में हर बार सिहर जाती हूँ
 मेरी सिहरन से परेशान , मेरा अक्स
 शीशे में झिलमिलाता वापस चला जाता है
 और मैं बन-सवर कर, तेरी याद को
 ख़ूबसूरती से भूल जाने की कोशिश करती हूँ

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