Tuesday, 30 October 2012

तुम्हारी याद


कोट की जेब में उंगलियों में ऊँगली उलझाती
सर्दी की सर्द हवाओं में कंपकंपाती
ठिठुर कर फिर  पास सिमटती जाती है
तुम्हारी याद

नए से शहर में दूर तक  जाती
कभी भीड़ में गुम हो जाती
कभी अंधेरे से  डर कर  लौट आती है
तुम्हारी याद

गले में मफलर सी लिपट सीने तक लहराती
कभी कानो पर  गर्म हथेली बनती
कभी बियर की बोतल पर ठंडी बूँद बन कर उतरती है
तुम्हारी याद



 




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