Wednesday, 4 January 2012

दास्ताँ -ए-मोहब्बत

यह दास्ताँ -ए-मोहब्बत है
 दास्ताँ समझती हैं न आप?
यह सिर्फ दर्द की दुनिया है
लोगों का मंजर है
चाँद जब भी कभी  सड़क के
टूटे गढ़े में
दीखता है, तो लोग खुश हो ही
जाते हैं
हंस देते हैं, की चलो आज चाँद भी
जमी पर पड़ा है
मैं रोज उस चाँद को हथेली में
उठा ,आसमान में छोड़ आती हूँ
जानतीं हूँ उसका दुःख
समझती हूँ उसका दर्द
दास्ताँ समझती हैं न आप?
प्यार को कई बार
मफलर की तरह उतरते देखा है
कभी मेज़ पर कभी जमीं पर पडे देखा है
दिल की बात  मत पूछना
बेचारा सुबह से हैरान परेशां घूमता है
उसकी एक झलक, एक नज़र, को तरसता है
दास्ताँ समझती हैं न आप?
तो कहिये किसकी दास्तान सुनाऊँ
चाँद की ? दर्द की?
सड़क के टूटे गीले-पन की?
लोगों के हुजूम की?
प्यार की ?या दिल की?
या मेरी या  तुम्हारी ?
दास्ताँ समझती है न आप?









Monday, 2 January 2012

तेरे खवाबों को याद में अपनी सुलगते देखा

आसमानी बादलों को सतरंगी होते देखा
मैने तेरी आँखों में चेहरा अपना उतरते देखा
तू छुप जा ख्यालों के भीड़ भाड़ में,पर
तेरे खवाबों को याद में अपनी सुलगते देखा