Saturday, 11 February 2012

तेरी याद का सिलसिला सा

एक तिनका सा आँख में फिसलता हुआ
तेरा गम है या तेरी याद का सिलसिला सा
हमको फिक्र है की वो बह न जाये
न बहे तो है कम्बखत एक नासूर सा






अक्स -ए-खुशबू हूँ बिखरने से न रोके कोई
और बिखर जाऊं तो मुझ को न समेटे कोई ....

Thursday, 9 February 2012

Poetry by Dr. Kumar vishvas


एक चेहरा था ,दो आखें थीं ,हम भूल पुरानी कर बैठे .
एक किस्सा जी कर खुद को ही, हम एक कहानी कर बैठे ...

हम तो अल्हड-अलबेले थे ,खुद जैसे निपट अकेले थे ,
मन नहीं रमा तो नहीं रमा ,जग में कितने ही मेले थे ,

पर जिस दिन प्यास बंधी तट पर ,पनघट इस घट में अटक गया .
एक इंगित ने ऐसा मोड़ा,जीवन का रथ, पथ भटक गया ,

जिस "पागलपन" को करने में ज्ञानी-ध्यानी घबराते है ,
वो पागलपन जी कर खुद को ,हम ज्ञानी-ध्यानी कर बैठे.

एक चेहरा था ,दो आखें थीं ,हम भूल पुरानी कर बैठे .
एक किस्सा जी कर खुद को ही, हम एक कहानी कर बैठे .

mirza ghalib

ये जिद , की आज न आवे और आये बिन न रहे 
क़ज़ा से शिकवा हमें किस क़दर है, क्या कहिये 

मन

when i have to read you
to know you, to learn you
i fail to give you that time my friend
and i feel one day i will take out some time
from my not so busy schedule and 
read you and know you and learn you

कितनी सदियाँ बीत गयी
मन को समझाते
कभी वो समझता नहीं
कभी मुझ को समझा जाता है 

Wednesday, 8 February 2012

an unspoiled day

It is an occasion of an unspoiled day.
Almighty has entrusted me this day to account as my option,
I can squander it or value it for good.
What I execute today is crucial, because
I am switching over 24 hours of my lifespan for it.
When futurity comes,
this day will abscond till time stops,
abandoning in substitution the existence
that I have merchandised for it.
I desire to be in profit not waste ;
fair not foul ; boon not bane;
In propriety that I shall not heartache
the barter, I settled for it.

(Hope you like it .It is in sequence to ' waqt ') 

by vipin sharma

By dr. kumar vishvas

लौटते समंदर के रेत पर
बची रह गयीं प्यास की लकीरों जैसी
आधी रात इक गुमनाम स्टेशन के
उबे हुए मुसाफिरखाने की
थक कर पकतीं नीदों में
गूँजतीं इंजन की रोबदार आवाज़
मुझे करवटें बदलवा कर
फिर-फिर याद दिलातीं है
इक अनहद अब भी ज़िन्दा है
जो बस तुम्हारी आवाज़ से जगता है .

मेरे लफ्ज़

होठों पर रखे लफ्ज़ मायूस से हैं मगर
पहले दिल की ,फिर मेरी, तब लफ्जों की बारी है....

Monday, 6 February 2012

दिल

है दिल सिर्फ  एक यही उम्मीद 
की चैन से जिए और मुझे भी जीने दे

इंतज़ार

इंतज़ार  को मालूम था , 
की तुम न आओगे आज भी
हमने  भी अपने दिल को
बहला कर सुला दिया.........

Sunday, 5 February 2012

यह जो वक्त है

यह जो वक्त है
वो गया नहीं 
कभी कहीं से 
आया नहीं
हम रोज सोचते रहे
की आज नयी सुबह है
की आज  नयी रात है 
यह जो वक़्त है
वो ठहरा  रहा
हम रोज भागते रहे
कभी उसकी तलाश में 
कभी अपनी तलाश में
यह वक़्त कभी 
रुका  नहीं
कभी कहीं थका  नहीं
हम रोज उम्र गुजार कर
उही कहीं जीते रहे
मुझे सिर्फ एक तलाश है
सिर्फ वक़्त की तलाश है.







मिर्ज़ा ग़ालिब



या रब वो न समझे हैं न समझेंगे मेरी बात 
दे और दिल उनको, न दे मुझको जुबान और