Saturday, 26 May 2012

मैं तुम्हे भूल चुकी हूँ

मैं तुम्हे भूल चुकी हूँ
पर युही सुबह अदरख की चाय 
तुम्हारी दी हुई मुस्कान पर मीठास लाती है 

मैं तुम्हे भूल चुकी हूँ 
बस युहीं कभी सपने में मेरे आते हो
अचानक तकिये को सीधा कर फिर लेट जाते हो

मैं तुम्हे भूल चुकी हूँ 
बस  युही रोज, मेरी पलकों पर बैठ
मेरी  आँखों से दूर कहीं देखते हो

पर सच कहूँ, तुम मुझे याद नहीं आते
मैं तुम्हे भूल चुकी हूँ





Friday, 25 May 2012

निदा फ़ाज़ली


देखा गया हूँ मैं कभी सोचा गया हूँ मैं
अपनी नज़र में आप तमाशा रहा हूँ मैं
मुझसे मुझे निकाल के पत्थर बना दिया
जब मैं नहीं रहा हूँ तो पूजा गया हूँ मैं
मैं मौसमों के जाल में जकड़ा हुआ दरख़्त
उगने के साथ-साथ बिखरता रहा हूँ मैं
ऊपर के चेहरे-मोहरे से धोखा न खाइए
मेरी तलाश कीजिए, गुम हो गया हूँ मैं

निदा फ़ाज़ली

यही है जिन्दगीं कुछ खाब ,चंद उम्मीदें ,
इन्हीं खिलौनों से ,तुम भी बहल सको, तो चलो !
कहीं नहीं है कोई सूरज , धुआं - धुआं है फिज़ा ,
खुद अपने आप से बाहर निकल सको, तो चलो !!(निदा फ़ाज़ली ).

Wednesday, 23 May 2012

ख़ामोशी

ख़ामोशी की आवाज़ जरा ध्यान से सुनो 
चुप है , लेकिन दिल से बात करती है।....

मैं और तुम

हर मुलाकात पर  रुक जाता गर मैं 
         शाम हो जाती तुझ तक पहुचने में..........

Tuesday, 22 May 2012

तुम

तुम चली जायोगी 
याद तो आयोगी न ?
अपनी यादों को कहना 
जब भी कभी वो अकेली हो 
तो फोन पर बात करे  
यादों की एक अजीब सी आदत है 
खुद ही खुद से बात करती है 
तुम यादो की बातों को रोक
मुझसे बात करना
कैसे कहूँ की परेशानी नहीं होगी
परेशानियों को चुनकर-गिनकर
उन पर जोर से हसना
दोनों अंजुरी से अपने
घोसले को दिन रात संभालना
कभी जब भारी समस्या हो 
तो अंजुरी खोल, दोनों बाजुओं
से झकझोड़ देना
और  सुनो जब गर्मी की
पहली बरसात हो
तो नंगे पैर पानी में छप छप
नहाना और खूब हंसना
इतना की तुम्हारी हंसी
यहाँ तक सुनाई दे
और मैं कह सकूँ सब से
की उसकी यादें रोज हंसती हैं


तुम चली जायोगी 
याद तो आयोगी न ?





मैं और तुम

मौत आई है, पूछती है की कब चलना है ?
तेरा इंतज़ार करूँ की मौत को वक़्त दे दूँ ?

मैं और तुम

तुम नहीं  आये ,बहार फिर भी आई है 
हसीं हरयाली से जख्म फिर हरा हो उठा .... 

Monday, 21 May 2012

nasser kazmi


कौन इस राह से गुज़रता है
दिल यूँ ही इंतज़ार करता है

देख कर भी न देखने वाले
दिल तुझे देख-देख डरता है

शहर-ए-गुल में कटी है सारी रात
देखिये दिन कहाँ गुज़रता है

ध्यान की सीढ़ियों पे पिछले पहर
कोई चुपके से पाँव धरता है

दिल तो मेरा उदास है "नासिर"
शहर क्यों सायँ-सायँ करता है


Sunday, 20 May 2012

धड़कन

धडकनों तुम भी सो जाओ की अब रात हो चली 
सुबह उठ कर फिर से  उसकी राहों में बिछना है..........