Saturday, 4 August 2012

मैं अग्नि हूँ

मैं अग्नि हूँ
अग्नि हूँ , मेरी किस्मत यह है
जलती हूँ मैं खुद, सबको भस्म कर के
आग की लपटों  से चुन लेती हूँ मैं आहें
इसके पहले की वो आसमान से मिले
राख के ढेर से लोग ले जाते हैं "कुछ"
मैं बुझ जाती हूँ , तेरी , उम्र लिए

और कुछ देर चिरागों अभी जलते रहना

और कुछ देर चिरागों अभी जलते रहना
हर आस ,हर उम्मीद धुआं धुआं सा है
दिल-ए-अरमान भी बुझा बुझा सा है
एक तेरी लौ जो टिमटिमाती  है
कभी बुझती है कभी खुद से जल जाती है
एक सुरंग से आती रौशनी की तरह
 तू  ही है की साथ मेरे जलता है
और कुछ देर चिरागों अभी जलते रहना

Thursday, 2 August 2012

और कुछ देर चिरागों अभी जलते रहना

और कुछ  देर चिरागों युहीं जलते रहना 
मुमकिन है ,की दुनिया ने समझा ही नहीं
कितना  मुश्किल है दिन रात युहीं जलते रहना 
मैं तो खुश हूँ की तू साथ मेरे जलता है
वर्ना मशरूफ  जमाने का  वक़्त बर्बाद करते
युहीं रोज दर्द-ए -जिगर दिखाने क्या जाते  
और कुछ  देर चिरागों युहीं जलते रहना

और कुछ देर चिरागों अभी जलते रहना
सफ़र में मुमकिन है वो साथ चले  भी नहीं
मंजिल-ए -दिल शायद कभी मिले भी नहीं
कितने अधूरे अफसाने लिये महकती है फिजा
कितनी बिखरी हुई आरजू लिये उडती है हवा
एक तू है की साथ मेरे जलता है
और कुछ देर चिरागों अभी जलते रहना .....

और कुछ देर चिरागों अभी जलते रहना 
रास्ते में हैं अंधेरे नसीबों की तरह 
हर मुस्कान के पीछे रुसवाई है 
हर शख्श से दूर उसकी परछाई हैं 
एक तू है की साथ मेरे जलता है 
और कुछ देर चिरागों अभी जलते रहना  

और कुछ देर चिरागों अभी जलते रहना
नये मुसाफिर को राहें गुमराह करती हैं
हर एक ठोर को मंजिल समझता है
हर नयी उम्मीद पर दिन बदलता है
हर नये ख्वाब को दिल, सच समझता है
एक तू है की साथ मेरे जलता है
और कुछ देर चिरागों अभी जलते रहना...


और कुछ देर चिरागों अभी जलते रहना
हर आस ,हर उम्मीद धुआं धुआं सा है
दिल-ए-अरमान भी बुझा बुझा सा है
एक तेरी लौ जो टिमटिमाती  है
कभी बुझती है कभी खुद से जल जाती है
एक सुरंग से आती रौशनी की तरह
तू  ही है की साथ मेरे जलता है
और कुछ देर चिरागों अभी जलते रहना


और कुछ देर चिरागों अभी जलते रहना
कितनी मजबूर है मोहबत यह तू देख जरा
आह भर्ती है मोहबत  पर कहती नहीं
कितने अफसाने देखे है तूने ख़त्म होते
कितने परवाने देखे है शमा पर फन्ना होते
कितनी आँख से आंसू बहे मोम बनके
एक तू है की साथ मेरे जलता है
एक तू है की साथ मेरे पिघलता है






Wednesday, 1 August 2012

तन्हानियाँ है मजबूर , इनकी यह फितरत है

तन्हानियाँ है मजबूर , इनकी यह फितरत है
हमारे पास चली आतीं है मुंह छुपाने को ...



मुईन अह्सन जज़्बी

अपनी सोई हुई दुनिया को जगा लूं तो चलूं
अपने ग़मख़ाने में एक धूम मचा लूं तो चलूं

और एक जाम-ए-मए तल्ख़ चढ़ा लूं तो चलूं


अभी चलता हूं ज़रा ख़ुद को संभालूं तो चलूं


जाने कब पी थी अभी तक है मए-ग़म का ख़ुमार

धुंधला धुंधला सा नज़र आता है जहाने बेदार

आंधियां चल्ती हैं दुनिया हुई जाती है ग़ुबार


आंख तो मल लूं, ज़रा होश में आ लूं तो चलूं

 वो मेरा सहर वो एजाज़ कहां है लाना
 मेरी खोई हुई आवाज़ कहां है लाना
 मेरा टूटा हुआ साज़ कहां है लाना
  एक ज़रा गीत भी इस साज़ पे गा लूं तो चलूं

मैं थका हारा था इतने में जो आए बादल

किसी मतवाले ने चुपके से बढ़ा दी बोतल

उफ़ वह रंगीं पुर-असरार ख़यालों के महल


ऐसे दो चार महल और बना लूं तो चलूं



मेरी आंखों में अभी तक है मोहब्बत का ग़ुरूर

मेरे होंटों को अभी तक है सदाक़त का ग़ुरूर

मेरे माथे पे अभी तक है शराफ़त का ग़ुरूर

ऐसे वहमों से ख़ुद को निकालूं तो चलूं


मुईन अह्सन जज़्बी

और कुछ देर चिरागों अभी जलते रहना

और कुछ देर चिरागों अभी जलते रहना 
रास्ते में हैं अंधेरे  नसीबों की तरह 
हर एक मुस्कान के पीछे   रुसवाई  है  
हर शख्स से दूर उसकी परछाई हैं 
एक तू है की साथ मेरे जलता है 
 और कुछ देर चिरागों अभी जलते रहना 
 

खुदा ने तो रोका था , खता से पहले

खुदा ने तो रोका था , खता से पहले
यह नामुराद दिल ,क्या सुनता है किसी की?????

Tuesday, 31 July 2012

और कुछ देर चिरागों युहीं जलते रहना

और कुछ  देर चिरागों युहीं जलते रहना 
मुमकिन है ,की दुनिया ने समझा ही नहीं
कितना  मुश्किल है दिन रात युहीं जलते रहना 
मैं तो खुश हूँ की तू साथ मेरे जलता है
वर्ना मशरूफ  जमाने का  वक़्त बर्बाद करते
युहीं रोज दर्द-ए -जिगर दिखाने क्या जाते  
और कुछ  देर चिरागों युहीं जलते रहना