Friday, 21 September 2012

akbar allahabadi

हंगामा है क्यूँ बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है
डाका तो नहीं डाला, चोरी तो नहीं की है

ना-तजुर्बाकारी से, वाइज़[1] की ये बातें हैं
इस रंग को क्या जाने, पूछो तो कभी पी है

उस मय से नहीं मतलब, दिल जिस से है बेगाना
मक़सूद[2] है उस मय से, दिल ही में जो खिंचती है

वां[3] दिल में कि दो सदमे,यां[4] जी में कि सब सह लो
उन का भी अजब दिल है, मेरा भी अजब जी है

हर ज़र्रा चमकता है, अनवर-ए-इलाही[5] से
हर साँस ये कहती है, कि हम हैं तो ख़ुदा भी है

सूरज में लगे धब्बा, फ़ितरत[6] के करिश्मे हैं
बुत हम को कहें काफ़िर, अल्लाह की मर्ज़ी है

Thursday, 20 September 2012

कुछ इस तरह बरसा .

कौन सा साल था? कौन सा दिन ? कुछ याद नहीं..
तेरी यादों  का बादल  ,कुछ इस तरह बरसा ......

Wednesday, 19 September 2012

भूल जाउंगी मैं तुमको

भूल जाउंगी मैं तुमको भी, मुझको मालूम  है
एक जुर्म का हिस्सा है ,मेरी रूह और मैं।।।।।।।

Tuesday, 18 September 2012

मेरा अक्स

आयने से  निकल कर, मेरा अक्स
मुझे , अपने साथ लिये जाता है
 मैं जागती आँखों का सपना बन
 दूर तक, साथ उसके जाती हूँ
 आँखों की लम्बी एक टक नजर
 मुझको दर तक तेरे छोड़ जाती है
  दरवाजा खटका दूँ या चली आऊं वापस ?
 इसी पशो-पेश में हर बार सिहर जाती हूँ
 मेरी सिहरन से परेशान , मेरा अक्स
 शीशे में झिलमिलाता वापस चला जाता है
 और मैं बन-सवर कर, तेरी याद को
 ख़ूबसूरती से भूल जाने की कोशिश करती हूँ

Monday, 17 September 2012

kaifi aazmi

तुम परेशां न हो बाब-ए-करम-वा न करो
और कुछ देर पुकारूंगा चला जाऊंगा
इसी कूचे में जहां चांद उगा करते थे
शब-ए-तारीक गुज़ारूंगा चला जाऊंगा

रास्ता भूल गया या यहां मंज़िल है मेरी
कोई लाया है या ख़ुद आया हूं मालूम नहीं
कहते हैं कि नज़रें भी हसीं होती हैं
मैं भी कुछ लाया हूं क्या लाया मालूम नहीं

यूं तो जो कुछ था मेरे पास मैं सब कुछ बेच आया
कहीं इनाम मिला और कहीं क़ीमत भी नहीं
कुछ तुम्हारे लिए आंखों में छुपा रक्खा है
देख लो और न देखो तो शिकायत भी नहीं

फिर भी इक राह में सौ तरह के मोड़ आते हैं
काश तुम को कभी तन्हाई का एहसास न हो
काश ऐसा न हो ग़ैर-ए-राह-ए-दुनिया तुम को
और इस तरह कि जिस तरह कोई पास न हो

आज की रात जो मेरी तरह तन्हा है
मैं किसी तरह गुज़ारूंगा चला जाऊंगा
तुम परेशां न हो बाब-ए-करम-वा न करो
तुम परेशां न हो बाब-ए-करम-वा न करो
और कुछ देर पुकारूंगा चला जाऊंगा
इसी कूचे में जहां चांद उगा करते थे
शब-ए-तारीक गुज़ारूंगा चला जाऊंगा

रास्ता भूल गया या यहां मंज़िल है मेरी
कोई लाया है या ख़ुद आया हूं मालूम नहीं
कहते हैं कि नज़रें भी हसीं होती हैं
मैं भी कुछ लाया हूं क्या लाया मालूम नहीं

यूं तो जो कुछ था मेरे पास मैं सब कुछ बेच आया
कहीं इनाम मिला और कहीं क़ीमत भी नहीं
कुछ तुम्हारे लिए आंखों में छुपा रक्खा है
देख लो और न देखो तो शिकायत भी नहीं

फिर भी इक राह में सौ तरह के मोड़ आते हैं
काश तुम को कभी तन्हाई का एहसास न हो
काश ऐसा न हो ग़ैर-ए-राह-ए-दुनिया तुम को
और इस तरह कि जिस तरह कोई पास न हो

आज की रात जो मेरी तरह तन्हा है
मैं किसी तरह गुज़ारूंगा चला जाऊंगा
तुम परेशां न हो बाब-ए-करम-वा न करो
और कुछ देर पुकारूंगा चला जाऊंगा

और क्या है वंदना के बक्से में

 
स्कूल के भीड़ में घूमती रूह बंद है
तेजी से आँख के सामने से निकल जाती है ,
 
हर  एक दोस्त की हंसी कैद है ,
जो अब भी मन को खुश करती है
 
लम्बी सड़क पर हम-तुम जो निकल पडे थे
जाना तो याद है पर हम वापस  कैसे आये थे?
 
भोलापन जो था हमारे दिलों में था
वो अब भी  कभी कभी कहीं कहीं से झांकता है
 
पहले प्यार का पहला इंतज़ार अभी भी
दिल धरकाता है
 
दिल के टूटने की आवाज़ का शोर पड़ा  है
आंसुओ का गीलापन , सुख कर कोने में पड़ा है
 
स्कूल से "फुट" कर  कहीं भी  जाने
पर जो अपराध की भावना थी
वो भी बंद है
 
और यह सब तो सिर्फ उन दो साल की कहानी है... जब हम और तुम एक दुसरे को जानते थे........ याद का क्या??? इसे आदत है.. सब कुछ याद रखना..