Monday, 21 January 2013

एक उम्र भर की तलाश

खुद से निकल मैं सुनती रही
तुम्हारी और अपनी बात
मुँह से निकलते शब्द
बनते रहे शवेत  भांप
जैसे एक ठिठुरते कोने में
रात ने भी  काटी हो एक रात
जैसे कंठ से निकलते ही
शब्द खो देते हों खुद की पहचान
जैसे कुछ घंटों में मिट जाती हो
एक उम्र भर की तलाश
ऐसे ही मैं खुद से निकल कर
सुनती रही तुम्हारी और अपनी बात









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