Thursday, 14 March 2013

तन है एक ऐसा??.. अनुभव !



तन है एक ऐसा??.. अनुभव !
जिसमे हम दिन -रात, सुबह- शाम करतें हैं


रूह का पड़ाव है!कल इसे कहीं जाना है
आज भर हम -तुम  जीते और मरते हैं

रिवाजों और संस्कृति का बोझ है दुनिया पर
बोझिल मन बेचारा चुपचाप  झेलता रहता है

अच्छे- बुरे का तराजू है समाज भी
स्वम  को नहीं, और , सबको तौलता रहता है

लोग आते हैं पास मेरे, फिर कहीं खो से जातें है
मैं और मेरा पागल मन बाट  सबकी जोहता है

एकांकी मन मेरा! मुझमे मुझको खोजता है
इससे ! उससे सबसे यही  कहता है

कभी मिले वो  तो मिलाना मुझे भी!
कभी दीखे वो तो दिखाना मुझे भी











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