Friday, 5 April 2013

not bad banna......

मदहोश मुसाफिर, हूँ, फिर भी
होश में "दिन-रात" मुझे उठाते हैं

पीतीं हूँ जहर-ए -शराब फिर भी
लोगों की जेहरिली आँखों से डरती हूँ

मुझको मालूम है तुम्हारी याद मेरी दुश्मन है
फिर भी रोज उसको प्यार से पहलु में सुलाती हूँ

कैसी दुश्मन है शराब, फिर भी ए  दोस्त
तेरी याद, तुझसे दूर,पर  मेरे पास लाती है

मै  कल  उठू, और सोंचू की ये क्या लिखा
दिल, दर्द, दिमाग और शराब साथ गाती है





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