Monday, 24 June 2013

कुछ शब्द

जब भी तुमको, कुछ  लिखने को
चलती हैं मेरी उँगलियाँ
कागज पर  ,शब्द, खडे हो  कर
 मुझसे पूछते  हैं
यह क्या लिखा? यह क्यों लिखा?
फिर लिखना, फिर काटना, फिर छोड़ देना
फिर  कभी तुमको लिख न पाना
कभी तुमको कह न पाना
बिना कहे रह भी न पाना
कितना असहनीय है
कितना मुश्किल है
शब्दों और भावों का यह  कलह






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