Monday, 8 July 2013

खाली घोंसला




खाली घोंसला


खाली  घोंसला  है तैयार  मेरे रहने को
उम्र बीत जाती है , एक एक तिनका जोडते
बिछाते, हटाते ,ओढ़ते
कभी डरा कर समझाते  बच्चो  को
कभी खुद डर  कर  समझ जाते
एक पल भी दूर न जाने देने की चाह  में
इतनी दूर भेज देते की कोई लौटे भी तो कैसे?
पर जिंदगी  है तो इंतज़ार भी है।।। है न ???

जिंदगी  , एक गर्म हवा की तरह बाँध लेती है
कुछ भी नहीं कहती, सिर्फ जीती रहती है
कैसी  चाह , किसकी मर्जी ,कितनी  किस्मत
रोज तोल -टटोल  कर ,हमारा हाल पूछती है
वक़्त,चुप-चाप ऊँघता ,कभी खैय्नी की तरह पिसता
कभी दांतों तले दबा कर थूक देता है हमको .....है न ???

और हम ??????
और हम??  क्या कहूं ? किस खोज में
क्या समझने की धुन में
किस किस से मिलते बिछुड़ते
कहाँ से कहाँ पहुँच जाते है
और थोप देते हैं अपनी रुसवाई
 किस्मत के हाँथों  में .......है न???

किस्मत भी क्या चीज़ है
सोचो ?
क्या सोचती है किस्मत की कितनी
लाचारी में सोंची  जाती है वो अक्सर
"किस्मत " में  येही लिखा था ...
कह कर रोज हम किस्मत को
अपने सामने बड़ा बनातें  है
और स्वयं को कितना छोटा  ..... है न ??

खैर बात थी खाली घोंसले की
और दूर तक चली आइ , बहुत दूर
मेरे दिल के पास. जो दुनिया से अलग
मुझसे अलग , सबसे अलग  ,मुझमे धडकता है
मुझको कहता है की यह खाली  घोंसला
यादों से भरा है ... है न. ????







 

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