Thursday, 12 September 2013

randomites kuch yunhi

 


मेरी मासूम  ख्वाइशें पढ़ती रहती है
तुम्हारी अनकही बातें,तुम्हारी बोलती खामोशी। ……

मिलेगी कभी  मंजिल, भी तो पूछेगी
किस तरह राह बदल बदल कर मैं पहुँची  तुझ तक।

मेरी यादों में ही जीते रहे तुम रोजाना
 मरने को तो ख्वाब मेरे रोजाना मरते हैं

डायरी   के पन्नों में खोजो खुद को
हर पन्ने की मोड़ पर तुमको छुपा रखा है

गहरी साँस है जो तुमको पढ़ती है ,चुप रहती है
दिल भी ख़ामोशी से सर झुकाए रहता है







 

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