Thursday, 27 June 2013

तुम और मैं

न दी आवाज़ तुमने, शायद भूल बैठे हो
हमारे सपनो मे  भी आना छोड़ बैठे हो 

तुम और मैं

तुम्हारी और मेरी राहों में बस फ़र्क  इतना है
तुम काँटों पर चलते हो,मैं काँटों पर सोती हूँ                  

Monday, 24 June 2013

 दिल आज भरा भरा सा क्यूँ है ?
रात आँखों ने तो जम कर बरसात की थी


 
होती रहे  शाम अब  जिंदगी की
बचपन भी युहीं सुबह कहीं  चला  गया ......





कुछ शब्द

जब भी तुमको, कुछ  लिखने को
चलती हैं मेरी उँगलियाँ
कागज पर  ,शब्द, खडे हो  कर
 मुझसे पूछते  हैं
यह क्या लिखा? यह क्यों लिखा?
फिर लिखना, फिर काटना, फिर छोड़ देना
फिर  कभी तुमको लिख न पाना
कभी तुमको कह न पाना
बिना कहे रह भी न पाना
कितना असहनीय है
कितना मुश्किल है
शब्दों और भावों का यह  कलह