Friday, 3 January 2014

बैचैन दिल


अब  टूट चूका हूँ मैं तन्हाइयों से
और हर वक़्त शोर मचाती  तेरी यादों से ,
दिल का दर्द भी अब मुक्त हो उठा है
और रात - रात भी अभी अभी उठकर
गयी है एक तारा तलाशने
चाँद बेवफा निकला न
उसे कहाँ फुरस्त है
खुद के आधे  अधूरे और फिर पूरे होने से
बादल तो बस मुसाफिर हैं
अब बस थमना ही होगा
रुकना ही होगा
भूलना ही होगा
जीना भी होगा
रुक जाऊं? दो पल
शायद  रात अपना सितारा ढूंढ ले  (वंदना




 

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