Saturday, 29 March 2014

आज का "दिन",

आज का "दिन",फिर युहीं उतरा था मेरे आँगन में
मैने भी कहा जाओ  "दिन"
जाओ घूमो  और देखो
लोग तुमको आज कितना मनाते  हैं
कहीं रंगो क हुड़दंग है तो कहीं भंग का गंध
होली है  आज होली है
की  आवाज से मेरा "दिन" रह जाता है दंग
थका हारा लौटता है शाम को मेरे पास
लोग पूछतें हैं मुझसे कि
आज कैसे मनाया "दिन "
कैसे समझाउ  की  मैं  दिन नहीं मनाती
मैं  "लोग" मनाती  हूँ
दिन आज का "दिन"
मुझको "कल" से अलग नहीं दीखता
इसीलिए
मैं  रोज होली मनाती हूँ
रोज  दीवाली सजाती  हूँ 

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