Sunday, 8 June 2014

जब मैं कहानी बन जाऊं

जब मैं कहानी बन जाऊं

बस दूर मुझे मेरी आकृति सी दिखती है
धूप  में , खुले हुए सर्द केश
चुपचाप सी  बैठी हुई,
या बैठा दी गयी हुई
उठने , में, चलने में, सोने में
एक जमाना साथ चला चलता हो जैसे
हड़ियाँ  कराहतीं हो , हर बार हिलने पर
और जैसे  यूँ सूरज को देखती हुई
कई जन्म जी लेती, कई जन्म मर लेती है
मरने के इंतज़ार में जीती हुई जिंदगी
हर पल, हर लम्हा, कितने किस्से भरे हुए
जैसे रात गुजरती है धीरे से करवट लेकर
शायद मैं भी गुजर जाऊँ  युहीं चुपके से
तुम मिलना तो कहना लोगों से

वो यहीं बैठा करती थी
वो हर बात पर हँसती  थी
वो हर बात पर रोती  थी





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