Wednesday, 8 January 2014

दिल


दिल जब टूटता  है तो अरमान नहीं बाटे जाते
युहीं घुट के दफ़न होने  का रिवाज है जमाने में

 

रिश्तों के अर्थ

क्यूँ  पहचान करते  है इन रिश्तों से
गले में पड़ी  रहती है जंजीर की तरह

रिश्ते न टूटतें  है  न आवाज़ भरने देते  है
 धूमिल होते  कई रिवाज़ों की तरह

कभी हल्के से छु दो ढरा के बिखर जाएगी जिंदगी
न महसूस करो  तो उहीं  जिए जाती है बीमार कि तरह 
 

बारिशों के मौसम की खूशबू बदल गयी


मिटटी के भीगते ही जो लगती थी आग मुझे
मिटटी से दूर निकली तो बातें  बदल गयीं

हैरां  हूँ मैं और सोचती  हूँ  यही अकसर
कैसे तू मिला मुझे ?कैसे  मैं तुझसे मिली ?

तुझसे  बिछुड़ कर भी जिन्दा हूँ मैं मगर
तुझसे  मिली तो पल में जिंदगी महक गयी 

बारिशों के मौसम की  खूशबू बदल गयी
बहुत कुछ मैं भूली, और कुछ यादें बदल गयीं 










 

Monday, 6 January 2014

सावन

 जाने क्यूँ ऐसा होता है की सावन को मनाते मनाते
आसमा खफा होता रहता है, रंग बदलता रहता है 
सावन भी तो  किसी बिगड़े बच्चे कि तरह ,
कभी, कड़क के , कभी बरस के ज़िद  मनवाता रहता है