Saturday, 22 February 2014

धूप

दीवार पर धूप जब बिखरती है
थोड़े से सहारे के लिए
खुद की  गर्माहट से
दीवार की शीत को ढकती है
और फिर
एक पल या दो पल को
धूप  की आँख लग जाए
और सांझ हो जाए
तो शायद वहीँ दीवार पर
सरसराती  पुरवाई ओढ़े
धूप  सो जाए एक दिन के लिए 

Monday, 17 February 2014

तुम और मैं

तुम ओस की  बूंद बन गिरते रहो
मैं गुलाब की पंखुडी ,बन तुम्हे बटोरती रहूँ



 

Sunday, 16 February 2014

Me and my thoughts.......: randomites just yun hi

बादलों में  छुपा आसमां है या
 अरमानो से बिखरा जहाँ है
 चाँद खेलता है लुका-छुपी मुझसे
 चाँदनी सारे राज कह जाती है मुझसे 

randomites. kuch yun hi

हाँ दिल को छूते थे  तुम ,पर अक्सर भूल जाते थे 
बिखरे दिल बड़ी मुश्किल से सम्भाले जाते   हैं

वो कल जो तुमने लिखी थी कुछ  प्यार भरी  बातें
किताबों से उतर कर पंक्तियाँ , तितलियाँ बन बैठी

सुनो, बड़ी मुददत से एक बात कहनी थी तुमसे
छोड़ो ,जाने दो कभी ,अगले जन्मों  में  कह  दूँगी तुमसे 

दोस्ती


हाँ धूप में, बहारों ने, फूलों से दिल्लगी की  थी
जैसे तुमने उनसे, इनसे और  हमसे दोस्ती की थी