Wednesday, 5 March 2014

जिंदगी ( IT goes on)

जिंदगी हर रोज  चाँद को नए किस्से सुनाती  है 
चाँद उबा सा बैचैन  सा चला जाता है बादलों के पार 

जिंदगी हर रात के बाद सूरज को उठाया करती  है
सूरज, झुंझलाया सा निकलता है अँधेरे से हार 

जिंदगी युहीं  तनहाई में ढूंढती है खुद के होने के राज 
जाने क्यूँ  खुद को खुद से खफा सी पाती है कई बार।