Saturday, 29 March 2014

मैं और तू

सर उठा तो  दूं 
आसमान में चेहरा तेरा  दीखता है
सर झुका तो दूँ तो
मेरी परछाईं के साथ तू चलता है

आज का "दिन",

आज का "दिन",फिर युहीं उतरा था मेरे आँगन में
मैने भी कहा जाओ  "दिन"
जाओ घूमो  और देखो
लोग तुमको आज कितना मनाते  हैं
कहीं रंगो क हुड़दंग है तो कहीं भंग का गंध
होली है  आज होली है
की  आवाज से मेरा "दिन" रह जाता है दंग
थका हारा लौटता है शाम को मेरे पास
लोग पूछतें हैं मुझसे कि
आज कैसे मनाया "दिन "
कैसे समझाउ  की  मैं  दिन नहीं मनाती
मैं  "लोग" मनाती  हूँ
दिन आज का "दिन"
मुझको "कल" से अलग नहीं दीखता
इसीलिए
मैं  रोज होली मनाती हूँ
रोज  दीवाली सजाती  हूँ 

Friday, 28 March 2014

तनहाई

बहुत  अकेला सा था दिल  तुम्हारे बिना
तुमने भी तनहाई से अच्छी पहचान कराई--

तनहाई से मिली जो अधुरी जिंदगी  मेरी
जिंदगी ने जी भर कर तेरी कमी बतायी


Thursday, 27 March 2014

वादा

क्या कहूं ?क्यों इस मोड़ पर बैठी रही ताउम्र
जिंदगी बोल कर गयी थी "यहीं मिलूँगी "