Saturday, 26 April 2014

धूप




धीरे से गुनगुनाती धूप बिखर गयी 
अँधेरों को मनाती धूप मचल गयी 

Sunday, 20 April 2014

सुबह

धीरे से उठती हुई सुबह
कुछ ऐसा बिखेरती है
अपने सुनहरे गेसूं
की आकाश की नीली पलकें
मदहोश हो झपका जाती हैं
कुछ गर्म से आंसूं
और मैं हथेली उठा 
दुआ मांगती, समेट लाती हूँ
तेरे प्यार का जादू