Thursday, 8 May 2014

तुम्हारी याद

जैसे ही रात फैलती है अपनी काली स्याही लिए
तुम्हारी "याद" एक सुनहरी धूप  लिए उतरती है
और हम ,एक सोंधी सी अंगड़ाई में  उलझ कर
उस बिखरे से  छण  को सौ बार जी लेते हैं