Friday, 9 January 2015

वक़्त

फिर वही वक़्त की बात
वक़्त कहाँ है तुम्हारे पास
की तुम देखो
बिजली के नंगे तार पर
बारिश की एक बूँद धीरे धीरे
सहमती हुई दूसरी बूँद तक
बढ़ती है , इधर  उधर  देखती हुई
की अगर बादल छाए और बारिश हुई
तो उसकी कहानी पानी में  मिल जाएगी
धीरे धीरे सहमती  हुई की
किसी पागल चिड़िया के जोड़े
की  नजर उस पर पड़ी तो
 चिड़िया  शायद उसे गटक जाएगी
जोड़ा भी तो कितनी अठखेलियाँ करता है
पहले एक चिड़िया फुदकती है
थोड़ी दूर बैठती है
उसका जोड़ा फुदकता है
उसके पास बैठता  है
फिर  पहली चिडया उड़ती है
थोड़ी दूर बैठती है
फिर जोड़ा फुदकता है
उसके पास बैठता है
फिर वही वक़्त की बात
वक़्त कहाँ है तुम्हारे पास
की तुम देखो
एक बूँद को दूसरे बूँद तक पहुँचते
देख कर मैं  खुश होती हूँ
और मैं मुस्कराती हुई
अपनी कहानी जीती हूँ
सोचती हूँ की खुद की तलाश मेँ
कितनी लाचार,  कितना इंतज़ार
की अभी तक
दूसरी बूँद तक नहीं पहुंच पाई






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