Thursday, 13 August 2015

उम्र के नए मक़ाम पर

उम्र के नए मक़ाम  पर
क्या खोया क्या पाया
ये सोचने बैठी तो
खुद को जिंदगी की शाम पर
खड़ा पाया
और फिर वही दोतरफा रास्ता
और वही दोमुहें लोग
सोचती हूँ की शायद
यह मेरी ही भूल है
की मैने यह रास्ता चुना है
फिर सोचती हूँ की वो क्या है जो मैने सच में  चाहा??
और मिला भी है मुझे
फिर सोचती हूँ की जो हुआ
वो तो  होना ही था
और जब सब होना ही था
तो क्या चाहा मैने ???सच में चाहा मैने??
ये चौराहे।  ये दो मुहे लोग
और अकेली सी मैं
बहुत बेइन्साफ़ी सी लगती है

Wednesday, 12 August 2015

मेरे मसरूफ़ पलों मे भी
मेरे जहन में छुट्टी मनाती  है
तुम्हारी याद। ....