Wednesday, 23 August 2017

शायद

तुम्हारे और मेरे अँधेरे
एक जैसे से लगते हैं
तुम भी डूबे  रहते हो
मैं भी डूबी रहती हूँ
अपने अपने अंधेरों में
पर बातें हम रोज रौशनी
की  ही करतें हैं
सुरँग  के उस ओर  से
रौशनी की एक किरण
शायद  सिमट डाले हमारे
अंधेरों को
फिर शायद हम बढ़  पायें
सूरज की जमीं तक आती
किरणों की तरफ़.


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